आगही दाम-ए-शुनीदन जिस क़दर चाहे बिछाए ❤️


आगही दाम-ए-शुनीदन जिस क़दर चाहे बिछाए
मुद्दआ अन्क़ा है अपने आलम-ए-तक़रीर का
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